भारतीय किसानो के लिए निबंध (भारत एक कृषि प्रधान देश है ,हमारे जीवन के लिए कृषि बहुत जरुरी है | )किसानो की भूमिका |
रूपरेखा -1 ) प्रस्तावना , ( 2 ) भारतीय अर्थव्यवस्था में कोष का महन्च , ( 3 ) भारत में कृषक परिवारों का वगीकरण , ( 4 ) स्वतन्त्रता के बाद फसलोत्पादन को प्रगति , ( 5 ) हरित क्रान्ति , ( ) जनसंख्या वृद्धि के कारण भारतीय कृषि में रान गोनेवाली समस्याएँ ( 1 ) देश में भूपि सुधार एवं उत्पादन वृद्धि के लिए किए गए प्रयास , ( S ) भारतीय कपि न वी सामाननाए । उपसंहार '
प्रस्तावना जनतन्त्र का सफलता के लिए यह आवश्यक है कि देश आर्थिक रूप से भी स्वतन्त्र हो । देशा में ऐसो आर्थिक व्यस्था की जाए , जिससे बेकारी और भुखमरी का अन्त हो जाए तथा प्रत्येक नागरिक त्रस्थ , सुखी और शिक्षित हो । स्वतन्त्रता के उपरान्त भारतीय कृषि के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए हैं , जिनके फलस्वरूप कृषि उत्पादन में निरन्तर जाद्ध हुई है । इस दिशा में अभी और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है ।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व - भारत को लगभ
ग 71 % जनसंख्या त्यक्ष रूप से जय र निर है । हा ताण भारत को एक कृषिप्रधान दश माना जाता है । भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का मदन निम्नलिखित तथ्यों से भली - भाँति रूप हो जाएगा- ( 1 ) भारतीयों को आजीविका का प्रमुख साधन --- कृषि व्यवसाय में भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 67 % भाः । प्रत्यक्ष रूप से संतान है ; अतः कृषि भारतीयो की आजीविका का प्रमुख साधान है । ( 2 ) कृषि राष्ट्रीय आय में एक बड़ा भाग प्रदान करती है -- राष्ट्रीय आय का लगभग 817 पण कृषि आप से ही प्राप्त होता है । ( 3 ) सर्वाधिक भूमि उपयोग-- देश के कुल क्षेत्रल के सर्वाधिक भाग , लगभग 12 % में खेती की जाती है । ( 1 ) अनेक उद्योग कृषि पर आधारित है - भारत के अनेक उद्योग कतले माल के लिए कृषि पर ही आधारित हैं , जैसे - सूती वस्त्र , जूट , चीनी , हथकरघा , वनस्पति तेल उद्योग आदि । ( 5 ) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की अनेक वस्तुएँ कृषि पर निर्भर हैं - भारत अपने कुल निर्यात का 70 % भार कृषि उपजों से बने पदार्थो के रूप में निर्यात करता है । ( 6 ) कृषि परिवहन सेवाओं का भी विकास करती है- कृषि उत्पादों को ढोने में रेल एवं सड़क परिवहन का उल्लेखनीय योगदान है । इस प्रकार कृषि , परिवहन सेवाओं का भी विकास करती है ।
ग 71 % जनसंख्या त्यक्ष रूप से जय र निर है । हा ताण भारत को एक कृषिप्रधान दश माना जाता है । भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का मदन निम्नलिखित तथ्यों से भली - भाँति रूप हो जाएगा- ( 1 ) भारतीयों को आजीविका का प्रमुख साधन --- कृषि व्यवसाय में भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 67 % भाः । प्रत्यक्ष रूप से संतान है ; अतः कृषि भारतीयो की आजीविका का प्रमुख साधान है । ( 2 ) कृषि राष्ट्रीय आय में एक बड़ा भाग प्रदान करती है -- राष्ट्रीय आय का लगभग 817 पण कृषि आप से ही प्राप्त होता है । ( 3 ) सर्वाधिक भूमि उपयोग-- देश के कुल क्षेत्रल के सर्वाधिक भाग , लगभग 12 % में खेती की जाती है । ( 1 ) अनेक उद्योग कृषि पर आधारित है - भारत के अनेक उद्योग कतले माल के लिए कृषि पर ही आधारित हैं , जैसे - सूती वस्त्र , जूट , चीनी , हथकरघा , वनस्पति तेल उद्योग आदि । ( 5 ) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की अनेक वस्तुएँ कृषि पर निर्भर हैं - भारत अपने कुल निर्यात का 70 % भार कृषि उपजों से बने पदार्थो के रूप में निर्यात करता है । ( 6 ) कृषि परिवहन सेवाओं का भी विकास करती है- कृषि उत्पादों को ढोने में रेल एवं सड़क परिवहन का उल्लेखनीय योगदान है । इस प्रकार कृषि , परिवहन सेवाओं का भी विकास करती है ।
भारत में कृषक परिवारों का वकिरण - कृषक परिवारों को उनकी भू - जोत के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँट जा सकता है ( 1 ) भूमिहीन कृषक परिवार - यह ग्रामीण क्षेत्र का सबसे बड़ा और सबसे गरीब समूह है । इनकी संख्या हमारे ग्रामीण परिवारों के 30 % से भी अधिक है । भूमिहीन श्रमिक दूसरे लोगों की भूमि पर दैनिक मजदुरी पर काम करते हैं और कथा - कभी भू - स्वामी परिवार के ' बंधुआ ' भी हो जाते हैं । ( 2 ) सीमान्त कृषक परिवार --- इस वर्ग में वे कृषक परिवार सम्मिलित किए जाते हैं , जिनके पास भूमि के इतने छोटे टुकड़े होते हैं कि वे केवल उस भूमि की आय पर ही अपना निर्वाह नहीं कर पाते , अपितु उन्हें दूसरे लोगों की भूमि पर खेतिहर नजदूर के रूप में भी कार्य करना पड़ता है । ( 3 ) लघु कृषक परिवार - एक लघु अथवा छोटा किसान वह है , जो आत्मनिर्भर तो होता है , किन्तु जिसके पार बचतो के पर्याप्त साधन नहीं होते । इनके पास न तो अच्छी व पर्याप्त भूमि होती है और न ही अच्छा मशोनरी न अच्छी नस्ल के पर " और न ह . नई विवियां होती हैं । ( 4 ) धन एवं सम्मान कृषक परिवार कृषक परिवार आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होते हैं । इनके पास 5 हेक्टेयर भूम से लेकर 25 हेक्टेयर से भी अधिक भूमि पाई जाती है ।
स्वतन्त्रता के बाद फसलोत्पादन की प्रगति - स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात सभी फसलों के उत्पादन और प्रति हेको यर उत्पादन में प्राति हुई है । पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से भी कृषि उत्पादन में वृद्धि करने के प्रयास किए गए है । हाइजड बीज , खाद तथा उर्वरकों के प्रयाग , सिंचाई सुविधाओं के विस्तार तथा कृषि के मशीनीकरण द्वारा कृषि उत्पादों में अधिकाधिक वृद्धि हुई है । इस प्रगति का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है वर्तमान समय में भारत का चावल उत्पादन में विश्व में चीन के बाद दूसरा तथा गेहूँ उत्पादक देशों में दूसरे स्थान पर है । ज्वार और बाजरा खरीफ की प्रमुख फसल और मोटे अनाज है । इनके उत्पादन में भारत प्रथम स्थान पर है । विभिन्न प्रकार की जलवायु - दशाओं और मिट्टियों के होने के कारण मक्का का उत्पादन सर्वाधिक है । भारत दलहन का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है । तिलहन भी हमारे यहाँ की महत्त्वपूर्ण फसल तथा भोजन का अंग है । यहाँ पर विश्व की 76 % तिल , 20 % अरण्डी तथा 17 % सरसों उत्पन्न की जाती है । गन्ना के क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है । कपास भी भारत की प्रमुख रेशेदार फसल है । वर्तमान में इसकी प्रति हेक्टेयर उपज 218 किग्रा हो गई है । विश्व की खपत का 27 % चाय का उत्पादन कर भारत प्रथम स्थान पर है । यहाँ चाय की प्रति हेक्टेयर उपज 1678 किग्रा है । भारत में कहवा का उत्पादन दक्षिण - पश्चिमी क्षेत्रों में किया जाता है । 40 % जूट का उत्पादन कर भारत आज विश्व में प्रथम स्थान बनाए हुए है ।
हरित क्रान्ति - हरित क्रान्ति का अभिप्राय कृषि में वैज्ञानिक तकनीक , उन्नत एवं प्रामाणिक बीज रासायनिक उर्वरक , बहुफसली प्रणाली तथा सिंचाई के साधनों का विकास करके कृषि उत्पादन में वृद्धि करना है । भारतीय समाज पर हरित क्रान्ति के सामाजिक - आर्थिक प्रभावों का विवेचन निम्नलिखित है ( 1 ) हरित क्रान्ति एक महत्त्वपूर्ण कृषि कार्यक्रम है , जिसे भारत में चतुर्थ पंचवर्षीय योजना के दौरान लागू किया गया था । इससे कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई । ( 2 ) स्वतन्त्रता - प्राप्ति के बाद हम न केवल खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हुए हैं , अपितु अपने समीपवर्ती पड़ोसी देशों को खाद्यान्नों का निर्यात भी करने लगे हैं । ( 3 ) गहन , मिश्रित तथा व्यापारिक कृषि , फसलों की हेर - फेर प्रणाली , पट्टीदार अर्थात् सीढ़ीदार कृषि , कृषि ऋणों की सुगम व्यवस्था , कृषि उपजों के लाभकारी एवं समर्थन मूल्य , मृदा परीक्षण की सुविधा आदि के सुलभ होने से फसलोत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है । ( 4 ) कृषकों को उनकी उपज के लाभकारी मूल्य मिलने के फलस्वरूप उनकी क्रयशक्ति में वृद्धि हो गई है । आज वे न केवल कृषि साधनों को जुटाने में समर्थ हैं , वरन् जीवनोपयोगी अधिकांश वस्तुएँ भी उन्हें उपलब्ध हैं ।
जनसंख्या - वृद्धि के कारण भारतीय कृषि में उत्पन्न होनेवाली समस्याएँ - जनसंख्या वृद्धि के कारण भारतीय कृषि में निम्नलिखित समस्याओं ने जन्म ले लिया है ( 1 ) जनसंख्या का बढ़ता भारी दबाव - भारत में जनसंख्या बड़ी तीव्रगति से बढ़ रही है । वर्तमान में यह 100 करोड़ से ऊपर है । इस वृद्धि से प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धि कम होती जा रही है । अनुपजाऊ भूमि को कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित किया जा रहा है , पहाड़ों की चोटियों तक पर सीढ़ीदार खेत बनाए जा चुके हैं और विशाल वन क्षेत्रों को भी काट डाला गया है ; परन्तु इतना होने के उपरान्त भी कृष्य - भूमि का प्रति व्यक्ति औसत घटता ही जा रहा है । ( 2 ) कृषि विकास में बाधा – यद्यपि विभिन्न प्रयासों तथा हरित क्रान्ति द्वारा भरपूर कृषि उत्पादन लेने के प्रयास किए गए हैं , तथापि स्थानीय माँग अभी भी तीव्रगति से बढ़ती जा रही है । यदि हम उपलब्ध भूमि से और उत्पादन लेने का प्रयास करते हैं तो उसके ऋणात्मक परिणाम ही सामने आएँगे । ( 3 ) जोतों का घटता आकार — भारत में अधिकांश जोतें छोटी हैं तथा उनका वितरण भी असमान है । इन छोटी जोतों के कारण ही भारतीय कृषि , निर्वाह कृषि बनी हुई है । अधिकांश किसानों की जोते आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं है । ( 4 ) मृदा की प्राकृतिक उर्वरता में कमी - वनों और चरागाहों के कम होते जाने के कारण मृदा की प्राकृतिक उर्वरता को बनाए रखने के स्रोत सूखते जा रहे हैं । इन परिस्थितियों में निर्वाह कृषि निरर्थक बन गई है । कृषि में रासायनिक उर्वरकों , कीटनाशकों के उपयोग अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किए जा रहे हैं , परन्तु इन रसायनों के प्रयोग से भी मृदा की प्राकृतिक उर्वरता में कमी आती जा रही है ।
देश में भूमि - सुधार एवं उत्पादन - वृद्धि के लिए किए गए प्रयास हमारे देश में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं तथा कृषि कार्यक्रमों के आधार पर भूमि सुधार एवं उत्पादन वृद्धि के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं । इन प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है ( क ) भूमि - सुधार सम्बन्धी प्रयास - भारत में भूमि सुधार के लिए किए गए उल्लेखनीय प्रयासों के अन्तर्गत सभी राज्यों में जमीदारी प्रथा का उन्मूलन कर कानूनों के आधार पर लगान की धनराशि सुनिश्चित कर दी गई । विभिन्न अधिनियमों के आधार पर भू - स्वामियों द्वारा पट्टेदारों को बेदखल करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया और अधिकतम सीमा से अधिक भूमि का राज्य सरकारों द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया है । इस भूमि को और भूदान आन्दोलन के माध्यम से प्राप्त लगभग 12 लाख एकड़ भूमि को भूमिहीन किसानों में वितरित किग जा चुका है । भूमि की चकबन्दी के साथ - साथ सरकार द्वारा सहकारी खेती की दिशा में भी किसानों को गिरनार प्रेरित किया जा रहा है । ( ख ) उत्पादन वृद्धि के प्रयास - भारत में कृषि क क्षत्र में उत्पादन वृद्धि के लिए निम्नलिखित प्रयास किर गए है .-- 11 ) सरकार ने अधिक उपज देनेवाले सुधरे आर प्रामाणिक बीजो के वितरण की व्यवस्था की है । इनके उपयाग स गेहूँ तथा चावल का उत्पादन 76 % तक बढ़ गया है । ( 2 ) देश में रासायनिक उर्वरक के 50 कारखाने स्थापित किए गए हैं । इनके प्रयोग से कृषि - उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई है । ( 3 ) कृषि उत्पादन बड़ाने के लिए सिंचाई सुविधाएँ जुटाई हैं ( 4 ) पौधों तथा सलों को कीट - पतंगों से बचाने के लिए कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया गया है । ( 5 ) कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए ' गहन कृषि जिला कार्यक्रम ' तथा ' गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम ' लान किया गया है । इनमें बहुफसली कार्यक्रम अपनाकर उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया गया है । ( 6 ) कृषि में यन्त्रों का प्रयोग करके उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं । सरकार कम व्याज दर पर किसानों को यन्त्र उपलब्ध करा रही है । ( 7 ) देश में कृषि शिक्षण के लिए 21 विश्वविद्यालय खोले गए हैं । भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद ' भी इस ओर प्रयत्नशील है । रेडियो तथा दूरदर्शन पर भी कृषि उत्पादन बढ़ाने के उपाय बताए जाते हैं । भारतीय कृषि की भावी सम्भावनाएँ — ' भारत में कृषि के क्षेत्र में हुई प्रगति तथा देश में उपलब्ध संसाधनों की दृष्टि से भारतीय कृषि के विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ है । इनमे से कुछ प्रमुख निम्नलिखित है ( 1 ) उर्वरक उपभोग और अधिक उपज देनेवाली तकनीक का विस्तार करके उन फसलों के क्षेत्र में भी उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है , जिनमें अभी तक अपेक्षित उत्पादन स्तर नहीं था । ( 2 ) लघु , मध्यम एवं विशाल स्तरीय सिंचाई - परियोजनाओं का विस्तार करके दूर - दराज के क्षेत्रों में भी कृषि - उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है । ( 3 ) जहाँ सिंचाई के लिए जल पहुंचना सम्भव नहीं है , ऐसी कृषि भूमि में उचित प्रकार के प्रौद्योगिकीय मुधारों को लागू करने की सम्भावनाएँ हैं । ( 1 ) भू - सुधार कार्यक्रमो को कठोरता से लागू करके भूमि के दोषों से छुटकारा पाया जा सकता है ।
उपसंहार - विगत वर्षों से देश में हुए कृषि - सम्बन्धी प्रयासों के कारण कृषि उत्पादन में तीव्रगति से वृद्धि हुई है । देश में सर्वत्र हरित क्रान्ति की लहर दौड़ गई है । खाद्यानो के क्षेत्र में हम पर्याप्त सीमा तक न केवल आत्मनिर्भर हो गए हैं , वरन् हमने इनका निर्यात भी आरम्भ कर दिया है । इसमें सन्देह नहीं कि भारतीय कृषकों कृषि में नवीनतम साधनों का उपयोग करके जो क्रान्तिकारी परिवर्तन किए हैं , उनसे उनकी तत्परता एवं दृढ़ संकल्प का बोध होता है । फिर भी इतना स्पष्ट है कि जनसंख्या , भौगोलिक क्षेत्रफल और उपलब्ध संसाधनों की दृष्टि से जितनी प्रगति अपेक्षित थी , वह नहीं हो सकी है । अत : इस दिशा में और अधिक तत्परता के साथ समन्वित प्रयास किए जाने की आवश्यकता है

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Nice
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